सरायकेला: हाथियों को भगाना या संरक्षण? बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष पर उठे बड़े सवाल

सरायकेला: हाथियों को भगाना या संरक्षण? बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष पर उठे बड़े सवाल

Johar News Times
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सरायकेला (ईचागढ़-चांडिल) : क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे मानव-हाथी संघर्ष और हर सप्ताह हो रही मौतों ने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है—क्या वन विभाग का काम सिर्फ हाथियों को भगाना है, या उनके संरक्षण के साथ स्थायी समाधान तलाशना भी उसकी जिम्मेदारी है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि हाथी प्रभावित क्षेत्रों में अभी तक पर्याप्त चेतावनी बोर्ड नहीं लगाए गए हैं, जिससे अनजान लोग खतरे में पड़ जाते हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि रेड जोन जैसे संवेदनशील गांवों के प्रवेश मार्ग पर स्पष्ट रूप से “हाथी प्रभावित क्षेत्र” के बोर्ड लगाए जाएं, ताकि लोगों को पहले से सतर्क किया जा सके।

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विशेषज्ञों के अनुसार, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत किसी भी वन्य जीव के प्राकृतिक व्यवहार में हस्तक्षेप करना दंडनीय अपराध है। हाथियों को पटाखे, मशाल या तेज शोर से भगाना भी ‘हैरेसमेंट’ की श्रेणी में आता है। ऐसे में वन विभाग के सामने कानून और जनदबाव के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बन गया है।

हाल के दिनों में बढ़ती घटनाओं ने वन विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जब हाथी गांवों में प्रवेश करते हैं, तो विभाग केवल उन्हें खदेड़ने तक सीमित रहता है, जबकि स्थायी समाधान पर ठोस पहल नहीं दिखती।

विशेषज्ञ मानते हैं कि हाथियों के संरक्षण का दायित्व वन विभाग को दिया गया है, न कि उनके साथ छेड़छाड़ करने का। वर्तमान स्थिति में अधिकारी दोहरी दुविधा में फंसे हैं—अगर हाथियों को नहीं भगाते तो जनहानि का खतरा, और अगर भगाते हैं तो कानून के उल्लंघन का आरोप।

जानकारों का कहना है कि समस्या का समाधान केवल हाथियों को खदेड़ने में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक उपायों में छिपा है। दलमा कॉरिडोर को पुनर्जीवित करना, अवैध खनन पर रोक लगाना, जंगलों में पानी और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना, सोलर फेंसिंग लगाना और ग्रामीणों को जागरूक करना ही स्थायी रास्ता है।

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स्पष्ट है कि जब तक हाथियों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक यह संघर्ष थमने वाला नहीं है। वन विभाग के लिए यह समय केवल प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि संतुलित और स्थायी समाधान लागू करने का है।

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