जमशेदपुर के दलमा वन्यजीव अभयारण्य में 27 अप्रैल को आयोजित होने वाला पारंपरिक ‘दिसुआ सेंदरा’ पर्व इस बार विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस अवसर पर होने वाली आदिवासियों की महापंचायत ‘लो बीर दोरबार’ में कई अहम सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर मंथन किया जाएगा।
आदिवासी समाज में इस महापंचायत को सर्वोच्च परंपरागत न्याय व्यवस्था के रूप में देखा जाता है, जिसे कई लोग “सुप्रीम कोर्ट ऑफ ट्राइबल सोसाइटी” भी मानते हैं। इसमें कोल्हान क्षेत्र के साथ-साथ ओडिशा और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
इस वर्ष की महापंचायत में सबसे प्रमुख मुद्दा दलमा क्षेत्र में वन संरक्षण और बढ़ते पर्यटन विकास को लेकर उठ रहे सवाल होंगे। आदिवासी संगठनों का आरोप है कि जंगलों में कंक्रीट संरचनाओं और रिसॉर्ट्स के निर्माण से प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है, जिससे वन्यजीवों का आवास संकट में पड़ रहा है और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है।
संगठन का कहना है कि विकास के नाम पर जंगलों का व्यवसायीकरण किया जा रहा है, जो आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के लिए भी खतरा है। इस मंच से सरकार को कई मांगें भी सौंपी जाएंगी, जिनमें धार्मिक अधिकारों की रक्षा, कंक्रीट निर्माण पर रोक, पारंपरिक हथियारों से जुड़ी कार्रवाई पर पुनर्विचार और पर्यटन आय में स्थानीय हिस्सेदारी शामिल है।
दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंत्र कोल्हान के केंद्रीय सचिव सुखलाल पहाड़िया ने कहा कि जंगलों को बचाने के लिए आवश्यक होने पर आंदोलन की राह भी अपनाई जाएगी।
इस महापंचायत को लेकर क्षेत्र में व्यापक तैयारियां चल रही हैं और इसे आदिवासी समाज के भविष्य और अधिकारों से जुड़ी एक अहम बैठक माना जा रहा है।










