झारखंड के अलग राज्य आंदोलन के महानायक और ‘दिशोम गुरु’ के नाम से विख्यात शिबू सोरेन को आगामी 23 जून को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा जाएगा। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित एक गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु यह सम्मान प्रदान करेंगी। शिबू सोरेन के ऐतिहासिक और अद्वितीय सामाजिक-राजनीतिक योगदान के लिए दिए जा रहे इस सम्मान को उनकी ओर से उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ग्रहण करेंगे।
गणतंत्र दिवस 2026 पर हुई थी घोषणा, भारत रत्न की भी उठी थी मांग
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर शिबू सोरेन को पद्म भूषण देने का एलान किया था। गुरुजी के कद और झारखंड आंदोलन में उनकी भूमिका को देखते हुए राज्य में उन्हें ‘भारत रत्न’ देने की मांग भी बेहद जोर-शोर से उठी थी। इस संबंध में झारखंड विधानसभा से एक सर्वसम्मत प्रस्ताव भी पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया था।
महाजनी प्रथा के खिलाफ बिगुल और ‘रात्रि पाठशाला’ की शुरुआत
शिबू सोरेन का पूरा जीवन आदिवासियों के हक-अधिकार, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और सामाजिक सुधारों के लिए समर्पित रहा। उन्होंने शोषक महाजनी प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन का नेतृत्व किया। आदिवासी समाज में चेतना जगाने के लिए उन्होंने ‘धान कटनी आंदोलन’ और ‘शराबबंदी’ जैसे कई बड़े और कड़े सामाजिक अभियान चलाए।
70 के दशक में उन्होंने एक अनूठी पहल करते हुए आदिवासियों को शिक्षित करने के लिए ‘रात्रि पाठशालाएं’ शुरू कीं, ताकि दिनभर खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर और किसान रात में ककहरा सीख सकें। शिक्षा को सामाजिक क्रांति का सबसे बड़ा हथियार मानने वाले शिबू सोरेन को उनके इसी सेवा भाव के कारण पूरा झारखंड आज भी आदर और श्रद्धा से ‘गुरुजी’ कहता है।
अलग राज्य आंदोलन के जनक और कद्दावर नेता
शिबू सोरेन ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ की स्थापना कर अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को एक नई धार और दिशा दी, जिसके परिणामस्वरूप साल 2000 में झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राजनीतिक सफर में वे चार बार दुमका लोकसभा सीट से सांसद चुने गए, केंद्र सरकार में कोयला मंत्री रहे और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। पिछले वर्ष 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में इस महान विभूति का निधन हो गया था। यह पद्म भूषण सम्मान उनके सामाजिक, राजनीतिक और आदिवासी हितों के लिए किए गए ऐतिहासिक योगदान को राष्ट्र की ओर से एक सच्ची श्रद्धांजलि है।
