ब्रेन ट्यूमर का नाम सुनते ही अक्सर लोग दहशत में आ जाते हैं। फिल्मों, सोशल मीडिया और अधूरी जानकारियों ने इस बीमारी को लेकर आम जनता के बीच कई ऐसे मिथक पैदा कर दिए हैं, जिनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। डॉक्टरों का मानना है कि कई बार बीमारी से ज्यादा नुकसान उसके बारे में फैली गलत जानकारियां पहुंचाती हैं।
एस्टर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज एंड स्पाइन केयर के ग्रुप डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सतीश रुद्रप्पा के अनुसार, समय पर सही जानकारी और जांच से इस बीमारी का मुकाबला आसानी से किया जा सकता है। आइए जानते हैं ब्रेन ट्यूमर से जुड़े 5 बड़े मिथक और उनकी वैज्ञानिक सच्चाई।
1. मिथक: हर ब्रेन ट्यूमर कैंसर होता है
डॉक्टरों के मुताबिक, सभी ब्रेन ट्यूमर कैंसरयुक्त (Malignant) नहीं होते। कई ट्यूमर ‘बेनाइन’ यानी गैर-कैंसर वाले होते हैं, जो शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलते। हालांकि, दिमाग के भीतर जगह सीमित होने के कारण ये ट्यूमर भी दबाव बना सकते हैं, जिससे बोलने, चलने या याददाश्त पर असर पड़ सकता है। इसलिए ट्यूमर की गंभीरता उसके आकार और दिमाग में उसकी स्थिति से तय होती है।
2. मिथक: क्या मोबाइल फोन के इस्तेमाल से होता है ट्यूमर?
मोबाइल और ब्रेन ट्यूमर के कनेक्शन को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। लेकिन डॉ. सतीश रुद्रप्पा का कहना है कि दशकों की रिसर्च के बाद भी अब तक ऐसा कोई ठोस साइंटिफिक प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि मोबाइल का सामान्य इस्तेमाल सीधे ब्रेन ट्यूमर का कारण बनता है। ‘यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट’ की रिपोर्ट भी नियमित मोबाइल उपयोग और ट्यूमर के बीच किसी स्पष्ट संबंध को खारिज करती है।
3. मिथक: पहला लक्षण हमेशा सिरदर्द ही होता है
यह जरूरी नहीं है। हर मरीज में इसके लक्षण अलग हो सकते हैं। कई मामलों में सिरदर्द से पहले मरीज को दौरे पड़ना, नजर कमजोर होना, बोलने में परेशानी, हाथ-पैरों में कमजोरी आना, शरीर का संतुलन बिगड़ना या अचानक व्यवहार में बदलाव आने जैसे न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
4. मिथक: यह सिर्फ बुजुर्गों को होने वाली बीमारी है
ब्रेन ट्यूमर किसी भी उम्र में हो सकता है। नवजात बच्चों, युवाओं और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में भी विभिन्न प्रकार के ब्रेन ट्यूमर देखे जाते हैं। इसलिए कम उम्र का हवाला देकर न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को हल्के में लेना भारी भूल साबित हो सकता है।
5. मिथक: ब्रेन ट्यूमर का मतलब ‘लाइफ का एंड’ है
यह सबसे खतरनाक और गलत धारणा है। मेडिकल साइंस ने आज अभूतपूर्व प्रगति कर ली है। अत्याधुनिक ब्रेन इमेजिंग, रोबोटिक सर्जरी, सटीक रेडिएशन थेरेपी और नई दवाओं की मदद से आज कई मरीज इलाज के बाद पूरी तरह ठीक होकर एक सामान्य और खुशहाल जीवन जी रहे हैं।
बीमारी से डरने के बजाय सही समय पर जांच, सही इलाज और न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह ही इस बीमारी से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है।
