अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया गिरावट के बाद आम जनता को उम्मीद थी कि देश में पेट्रोल और डीजल के दाम कम होंगे। हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि फिलहाल ऐसी कोई राहत नहीं मिलने जा रही है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने स्पष्ट किया है कि कच्चे तेल की कीमतें घटने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि घरेलू बाजार में ईंधन के दाम तुरंत कम कर दिए जाएं।
केंद्रीय मंत्री ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत न घटने के पीछे कई तकनीकी और आर्थिक कारण बताए हैं। उन्होंने कहा कि ईंधन की खुदरा कीमतें केवल क्रूड ऑयल के बेस प्राइस पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि इसके निर्धारण में कई अन्य महत्वपूर्ण कारक भी शामिल होते हैं:
- एक्सचेंज रेट: डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर ।
- लागत और टैक्स: आयात लागत, परिवहन खर्च , और तेल कंपनियों का घाटा/लागत।
- सरकारी कर: केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले विभिन्न टैक्स और वैट ।
लंबे समय तक मंदी रही, तभी मिलेगी राहत
भारत अपनी ईंधन की जरूरत का लगभग 85 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार की हलचल का देश पर सीधा असर पड़ता है। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियों पर सरकार और तेल कंपनियों की लगातार नजर बनी हुई है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट लंबे समय तक टिकी रहती है और वैश्विक बाजार में स्थिरता आती है, तभी आने वाले समय में तेल कंपनियां समीक्षा कर आम उपभोक्ताओं को राहत देने का फैसला कर सकती हैं।
महंगाई पर पड़ता है सीधा असर
ईंधन की कीमतों का सीधा संबंध माल ढुलाई और परिवहन लागत से होता है, जिसके घटने या बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होती हैं। आम जनता को उम्मीद थी कि इस गिरावट से महंगाई से कुछ राहत मिलेगी, लेकिन सरकार के इस ताजा बयान से साफ हो गया है कि फिलहाल उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की पुरानी कीमतों से ही गुजारा करना होगा और किसी त्वरित कटौती की संभावना नहीं है।
