अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एक बड़ा और चौंकाने वाला रणनीतिक फैसला लिया है। अमेरिका ने अपनी सबसे बड़ी सैन्य कमांड ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड ’ का नाम बदलकर एक बार फिर से ‘यूएस पैसिफिक कमांड ’ कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय मुलाकात की चर्चाएं तेज थीं।
अपना ही 8 साल पुराना फैसला पलटा
यह कदम राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल (वर्ष 2018) के दौरान लिए गए फैसले को पूरी तरह पलटता है। 2018 में अमेरिका ने हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती रणनीतिक अहमियत और भारत के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार करते हुए ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ का नाम बदलकर ‘इंडो-पैसिफिक’ किया था। अब 2026 में इस नाम से ‘इंडो’ शब्द को हटा दिया गया है।
जिम्मेदारियों और अधिकार क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं
अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस पर सफाई देते हुए स्पष्ट किया है कि नाम बदलने से कमांड की संरचना, अधिकार क्षेत्र या रणनीतिक जिम्मेदारियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
- यह कमांड पहले की तरह ही अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैले विशाल क्षेत्र की सुरक्षा संभालेगी।
- रक्षा विभाग के मुताबिक, पुराने नाम को वापस लाने का उद्देश्य इस सैन्य कमांड की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देना है।
फैसले की टाइमिंग पर उठे सवाल, शशि थरूर ने कसा तंज
जी-7 समिट के इतर जब पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की संभावित बैठक पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं, ठीक उसी वक्त इस फैसले के आने से रणनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। कई विश्लेषक इसे प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया और तंज कसते हुए लिखा:
भारत के लिए क्यों बेहद अहम है यह कमांड?
यह सैन्य कमांड भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की धुरी रही है। इसी के जरिए दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय को बढ़ावा देते हैं। हवाई में स्थित इस कमांड के तहत 3.75 लाख से अधिक सैन्य और नागरिक कर्मचारी काम करते हैं, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी एकीकृत सैन्य कमांडों में से एक बनाता है।
