सरायकेला-खरसावां: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहां एक ओर बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ईचागढ़ क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे मानव-हाथी संघर्ष ने वन संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शनिवार को चांडिल वन क्षेत्र के तूतां और दुलमीडीह जंगल के समीप जलाशय क्षेत्र में हाथियों के एक झुंड को विचरण करते देखा गया, जिससे ग्रामीणों के बीच फिर से सतर्कता बढ़ गई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले छह से आठ वर्षों से दलमा वन्यजीव अभयारण्य से निकलकर हाथियों के कई झुंड ईचागढ़, चांडिल, नीमडीह और कुकड़ू प्रखंडों में लंबे समय से डेरा डाले हुए हैं। इसके कारण फसलों को नुकसान, घरों की क्षति तथा मानव-हाथी आमने-सामने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि हाथी सामान्यतः भोजन, पानी और सुरक्षित आवास की तलाश में अपने पारंपरिक मार्ग बदलते हैं। दलमा वन्यजीव अभयारण्य लगभग 193 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह चर्चा लगातार होती रही है कि हाथियों के पारंपरिक आवास क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों का प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पर्यटन सुविधाओं के विस्तार, सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों के कारण जंगलों पर दबाव बढ़ा है। वहीं, वन विभाग का कहना है कि हाथी-मानव संघर्ष को कम करने, जल स्रोतों के संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम किया जा रहा है।

क्षेत्र के लोगों का मानना है कि केवल पौधरोपण अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि हाथियों के प्राकृतिक आवास, जल स्रोतों और भोजन की उपलब्धता को भी प्राथमिकता देनी होगी। विशेषज्ञों का भी कहना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए जंगल संरक्षण, वन्यजीव कॉरिडोर की सुरक्षा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी है।
