गुड़ाबांदा (जमशेदपुर)। वर्ष 2010 में अस्तित्व में आए गुड़ाबांदा प्रखंड को 15 साल बीत जाने के बाद भी अब तक पूर्ण प्रखंड का दर्जा नहीं मिल सका है। स्थिति यह है कि कई महत्वपूर्ण विभाग आज भी स्थायी पदाधिकारियों के बजाय प्रभार के भरोसे संचालित हो रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय विकास प्रभावित होने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्थिति के अनुसार वर्तमान में प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) के साथ-साथ अंचलाधिकारी (CO) का कार्यभार भी प्रभार में ही चल रहा है। पहले यहां नियमित CO की नियुक्ति हुई थी, लेकिन सात माह के भीतर उनका तबादला हो गया। इसके बाद से यह पद लगातार प्रभार में ही संचालित है। ग्रामीणों का कहना है कि निचले स्तर के कर्मचारियों का तबादला तो नहीं होता, लेकिन पदाधिकारी आते-जाते रहते हैं, जिससे प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित होती है।
गुड़ाबांदा प्रखंड में करीब 60 हजार की आबादी निवास करती है। यह क्षेत्र धालभूमगढ़ और बहरागोड़ा प्रखंडों की कई पंचायतों को मिलाकर बनाया गया था, जिनमें सिंहपुरा, फॉरेस्ट ब्लॉक, भालकी, गुड़ाबांदा पंचायत, बालीजुड़ी, आंगरपाड़ा, बनमाकड़ी और मुड़ाकाटी शामिल हैं। इसके बावजूद क्षेत्र को अपेक्षित विकास नहीं मिल पाने की शिकायतें लगातार उठती रही हैं।
ग्रामीणों के अनुसार प्रखंड में केवल BDO का ही पद सृजित है, जबकि प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी, प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी, प्रखंड कृषि पदाधिकारी, श्रम पदाधिकारी, पशुपालन पदाधिकारी, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, महिला प्रसार पदाधिकारी और प्रखंड कल्याण पदाधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पद अब तक स्वीकृत नहीं किए गए हैं। अधिकांश कार्य अन्य प्रखंडों के अधिकारियों के प्रभार में संचालित होते हैं, जिससे सेवाओं की उपलब्धता प्रभावित होती है।
इधर प्रखंड परिसर में बने नए मॉडल भवन की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उचित रखरखाव और मरम्मत के अभाव में भवन धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा है और परिसर में गंदगी फैली रहती है। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि सभी सृजित पदों पर स्थायी नियुक्ति होती तो यह प्रखंड वास्तव में एक मॉडल प्रखंड के रूप में विकसित हो सकता था। लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि सांसद और दो विधायकों की मौजूदगी के बावजूद क्षेत्र में स्वास्थ्य, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं अब भी पूरी तरह सुलभ नहीं हैं।
