राजस्थान के पाली जिले की पारंपरिक चूड़ी इंडस्ट्री आज देश की दूसरी सबसे बड़ी चूड़ी निर्माण इकाइयों में शुमार हो चुकी है। करीब 100 साल पहले छोटे स्तर पर शुरू हुआ यह कारोबार अब एक बड़े उद्योग का रूप ले चुका है, जो न केवल लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है बल्कि हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर भी बना रहा है। पाली में बनने वाली चूड़ियों की मांग भारत के साथ-साथ अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कई अन्य देशों तक फैली हुई है।
पाली में चूड़ी कारोबार की शुरुआत वर्ष 1938 के आसपास बाबू भाई खान ने की थी। शुरुआती दौर में हाथी दांत और नारियल के खोल से चूड़ियां बनाई जाती थीं। बाद में आधुनिक तकनीक और प्लास्टिक सामग्री के इस्तेमाल से यह उद्योग तेजी से आगे बढ़ा। व्यवसायियों के अनुसार पहले जापान से प्लास्टिक एक्रेलिक शीट मंगाई जाती थी, जिससे चूड़ियां बनाई जाती थीं। समय के साथ प्लास्टिक पाइप से बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ।
आज पाली जिले में करीब 1,000 फैक्ट्रियां चूड़ी और चूड़ी पाइप बनाने का काम कर रही हैं। उद्योग से जुड़े व्यापारी मोहम्मद अयूब खान बताते हैं कि प्लास्टिक स्क्रैप को पिघलाकर कच्चा माल तैयार किया जाता है, जिससे पाइप बनते हैं और फिर हाथों से काटकर चूड़ियों का आकार दिया जाता है। इसके बाद इन चूड़ियों को महिलाओं के पास भेजा जाता है, जो उनमें पत्थर, मोती और अन्य सजावट का काम करती हैं।
इस उद्योग का सबसे बड़ा पहलू यह है कि इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं घर बैठे काम कर रही हैं। महिलाएं घरेलू कामकाज पूरा करने के बाद चूड़ियों की डिजाइनिंग और सजावट करती हैं और हर महीने 9 हजार से 15 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। कई महिलाएं प्रतिदिन 3,000 से 4,000 चूड़ियां तैयार कर रही हैं, जिससे उनके बच्चों की पढ़ाई और घरेलू खर्च आसानी से पूरे हो रहे हैं।
व्यापारियों के मुताबिक पाली से हर दिन लाखों चूड़ियां देशभर के बाजारों में भेजी जाती हैं। यह उद्योग न केवल राजस्थान की पारंपरिक पहचान को मजबूत कर रहा है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और स्थानीय रोजगार का भी बड़ा आधार बन चुका है।
ताजा खबरों और हर अपडेट के लिये जुड़े रहें — joharnewstimes.com










