जोहार न्यूज टाईम्स डेस्क: “मैंने फांसी का फंदा गले में डाल लिया था, स्टूल पर खड़ी थी और बस छलांग लगाने ही वाली थी… तभी खिड़की से सास ने देखा, लेकिन उन्होंने रोका नहीं। उनकी उस बेरुखी ने मुझे मरना नहीं, बल्कि लड़ना सिखा दिया।” यह शब्द हैं आईएएस सविता प्रधान के, जिनकी कहानी किसी फिल्म से भी ज्यादा दर्दनाक और किसी चमत्कार से ज्यादा प्रेरणादायक है।

सफलता का शिखर: पहले ही प्रयास में बनीं IAS
आज सविता प्रधान एक आईएएस अधिकारी हैं, लेकिन यहाँ तक पहुँचने के लिए उन्होंने जो कीमत चुकाई, वह कल्पना से परे है। बच्चों की अकेले परवरिश करते हुए उन्होंने न केवल पढ़ाई की, बल्कि अपने पहले ही प्रयास में UPSC 2017 की परीक्षा क्रैक कर सबको हैरान कर दिया। आज वे अपनी शक्ति का उपयोग उन महिलाओं और लड़कियों के हक के लिए कर रही हैं, जो आज भी हिंसा और अशिक्षा के अंधेरे में जी रही हैं।
घरेलू हिंसा का वो ‘नरक’ और बाथरूम में छिपाई रोटियां
सविता की शादी महज 16 साल की उम्र में एक संपन्न आदिवासी परिवार में हुई थी। जिसे पिता ने ‘बड़ा घर’ समझा था, वह सविता के लिए काल कोठरी बन गया।
- अमानवीय व्यवहार: उन्हें घर में नौकरों से भी बदतर रखा गया।
- भूख का संघर्ष: भूख मिटाने के लिए सविता अक्सर अपने अंतःवस्त्रों (Undergarments) में रोटियां छिपाकर बाथरूम ले जाती थीं और वहां छिपकर खाती थीं।
- शारीरिक प्रताड़ना: छोटी-छोटी बातों पर उन्हें इतना पीटा जाता था कि आज भी उनके शरीर पर जलने और कटने के गहरे निशान मौजूद हैं। एक बार तो उनके पति ने उन पर बाल्टी भरकर पेशाब तक फेंक दिया था, लेकिन सविता ने हिम्मत नहीं हारी, दोबारा नहाईं और अपना एग्जाम देने चली गईं।
जब मौत के करीब पहुँचकर वापस लौटी जिंदगी
अत्याचार जब सहनशक्ति से बाहर हो गए, तो सविता ने आत्महत्या का फैसला किया। उन्होंने अपने बच्चों को आखिरी बार चूमा और पंखे से साड़ी लटका ली। लेकिन उस वक्त अपनी सास की आंखों में ‘मरने की मौन अनुमति’ देखकर उनका दिल दहल गया। उन्होंने सोचा— “मैं ऐसे पत्थर दिल लोगों के लिए अपनी जान क्यों दूँ?” उसी पल उन्होंने फंदा फेंक दिया और अपने बच्चों को लेकर उस नर्क से भाग निकलीं।
बचपन: अभावों में पली-बढ़ी गांव की पहली ‘स्कॉलर’
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में जन्मीं सविता का संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था।
- उन्होंने गोबर उठाया, धान काटा और महुआ बीना।
- वे अपने गांव की 10वीं पास करने वाली पहली लड़की थीं।
- 7 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती थीं क्योंकि बस का 2 रुपये किराया देने की स्थिति भी परिवार की नहीं थी।
संघर्ष से सम्मान तक का सफर
ससुराल छोड़ने के बाद सविता ने पार्लर में काम किया, ट्यूशन पढ़ाया और अपनी पढ़ाई जारी रखी। उनकी मेहनत का पहला फल तब मिला जब उन्होंने मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा पास की। सरकार ने उन्हें 75,000 रुपये की स्कॉलरशिप दी, जिससे उन्हें आगे बढ़ने का हौसला मिला और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
निष्कर्ष: हार न मानने का नाम है ‘सविता’
सविता प्रधान की कहानी हमें सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी विपरीत क्यों न हों, अगर आप खुद पर विश्वास रखें, तो आप अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं। आज वे हजारों शोषित महिलाओं के लिए उम्मीद की एक किरण हैं।
जोहार न्यूज़ टाइम्स के साथ जुड़ें और ऐसी ही प्रेरक कहानियों के लिए हमें फॉलो करें। joharnewstimes.com










