चांडिल डैम जलाशय का जलस्तर अचानक बढ़ने से विस्थापित और तटीय इलाकों के किसानों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। जलाशय के आसपास स्थित हाथीनादा समेत दर्जनों गांवों में लगी रबी धान की फसल पूरी तरह जलमग्न हो गई है। गरीब किसानों की सालभर की कड़ी मेहनत और पूंजी पर पानी फिर गया है, जिससे पूरे क्षेत्र में हाहाकार मचा हुआ है।
खेतों में भरा दो फीट पानी: कुछ पका तो कुछ कच्चा धान डूबा
हाथीनादा और आसपास के गांवों की कृषि भूमि पर किसानों ने इस उम्मीद में रबी धान की खेती की थी कि इससे सालभर का गुजारा होगा। लेकिन अब खेतों में दो फीट तक पानी भर चुका है।
- पका धान: कई खेतों में फसल पककर तैयार थी, जिसे पानी भरने के कारण किसान काट नहीं पा रहे हैं।
- कच्चा धान: जिन खेतों में धान अभी कच्चा है, वहां पानी जमा रहने से फसल के सड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
किसानों का कहना है: “अगर अगले कुछ दिनों में पानी नहीं हटा, तो पूरी फसल खेत में ही सड़ जाएगी और हम दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे।”
आभूषण गिरवी रखकर की थी खेती, अब सब कुछ तबाह
पीड़ित किसानों ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि इस खेती के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने अपने घर के सोने-चांदी के आभूषण बंधक (गिरवी) रखकर बीज, खाद, कीटनाशक दवा और जुताई-रोपाई की व्यवस्था की थी। फसल डूबने से अब लागत निकालना भी नामुमकिन लग रहा है। खेती बर्बाद होने से गरीब किसानों की कमर पूरी तरह टूट चुकी है।

काशीपुर से लावा तक भारी तबाही, रबी ही था एकमात्र सहारा
बाढ़ के पानी से काशीपुर, लावा, ओड़िया, अंडा, हुटू और कल्याणपुर गांवों में धान की खेती सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। ग्रामीणों के मुताबिक:
- बरसात के मौसम में डैम का पानी बढ़ने से उनके खेत पहले ही जलमग्न रहते हैं, इसलिए वे खरीफ की फसल नहीं ले पाते।
- साल में केवल एक बार रबी के सीजन में ही वे खेती कर पाते हैं।
- अब एकमात्र सहारा रही रबी फसल भी डूबने से किसानों के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है।
प्रशासन और विधायक से गुहार: ’10-15 दिन के लिए खोलें डैम का गेट’
इस संकट की घड़ी में पीड़ित किसानों ने ईचागढ़ विधायक, जिला उपायुक्त (DC) और डैम डिवीजन कार्यालय के पदाधिकारियों से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। किसानों की स्पष्ट मांग है कि चांडिल डैम के रेडियल गेट को अगले 10 से 15 दिनों के लिए खोल दिया जाए, ताकि खेतों से पानी उतर सके और बची हुई फसल को सुरक्षित काटा जा सके।
“नहीं सुनी बात, तो करेंगे आत्महत्या”
किसानों ने प्रशासन और सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर समय रहते डैम का पानी कम नहीं किया गया, तो उनके पास जान देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। किसानों ने कहा, “अगर हमें आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और स्थानीय प्रशासन की होगी।”
न मुआवजा मिला, न बची जमीन: ग्रामीणों में भारी आक्रोश
हाथीनादा गांव के ग्रामीणों का गुस्सा इस बात पर भी है कि विस्थापन के इतने सालों बाद भी उन्हें अपनी जमीन का उचित मुआवजा आज तक नहीं मिला है। ऊपर से जो बची-कुची जमीन थी, वह भी डैम के पानी में डूब रही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रशासन तुरंत प्रभावित क्षेत्रों का हवाई या जमीनी सर्वे कराए और किसानों को हुए नुकसान का उचित मुआवजा दे।
