बोकारो: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता चम्पाई सोरेन ने आज विस्थापितों के हक की लड़ाई को एक नई धार दे दी है। रामगढ़ के घाटो से लेकर बोकारो तक के अपने सघन दौरे के दौरान उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अब विस्थापितों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कंपनी प्रबंधनों और सरकार को डेढ़ महीने का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो राज्यव्यापी बड़ा आंदोलन होगा।

आंदोलन की जमीन तैयार: पूजा-अर्चना के साथ लिया संकल्प
चम्पाई सोरेन के दौरे की शुरुआत रामगढ़ के घाटो से हुई, जहाँ उन्होंने सारूबेड़ा जाहेरस्थान में पूजा की। इसके बाद उन्होंने ललपनिया स्थित आदिवासी आस्था के केंद्र लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोम गाढ़ में मत्था टेका और विस्थापितों की जीत के लिए आशीर्वाद मांगा।
अनुभव की ताकत: पुराने आंदोलनों का दिया हवाला
मीडिया से बात करते हुए पूर्व सीएम ने अपने पुराने संघर्षों को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे:
- टाटा स्टील: 90 के दशक में उनके आंदोलन के कारण हजारों ठेका मजदूरों को स्थायी नौकरी मिली।
- UCIL (जादूगोड़ा): जहाँ पहले 4 एकड़ जमीन पर नौकरी मिलती थी, उनके संघर्ष के बाद 5 डिसमिल जमीन देने वालों को भी रोजगार मिलना शुरू हुआ।
- ईचा खरकाई डैम: उनके कड़े विरोध के कारण 86 गांवों को डूबने से बचा लिया गया।

डेढ़ महीने का ‘डेडलाइन’ और हल चलाकर दिया संदेश
चम्पाई सोरेन ने कड़े शब्दों में कहा कि कंपनी प्रबंधन के पास सिर्फ 45 दिन हैं। यदि अप्रेंटिस युवाओं को नौकरी और विस्थापितों की अन्य मांगें पूरी नहीं हुईं, तो “ऐसा जन आंदोलन होगा जिसे पीढ़ियां याद रखेंगी।” दौरे के अंतिम चरण में शिबूटांड़ गांव पहुंचकर उन्होंने एक प्रतीकात्मक लेकिन सशक्त कदम उठाया। उन्होंने स्वयं हल-बैल चलाया और एलान किया कि समाधान न होने पर पूरे राज्य के विस्थापित बोकारो की खाली जमीनों पर हल चलाकर अपना अधिकार जताएंगे।
विस्थापितों का दर्द: “गांवों का अस्तित्व मिटाने की साजिश”
मोदीडीह गांव में विस्थापितों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि ऑनलाइन फॉर्मों से उनके गांवों के नाम तक हटा दिए गए हैं। इस पर सोरेन ने दुख जताया और कहा कि कोल्हान की तरह अब वह इस क्षेत्र के विस्थापितों को भी उनका हक दिलाकर रहेंगे। उन्होंने दिवंगत आंदोलनकारी प्रेम प्रसाद महतो को याद करते हुए कहा कि उनकी प्रेरणा ही उन्हें यहाँ खींच लाई है।
प्रमुख बिंदु:
- लक्ष्य: विस्थापितों और अप्रेंटिस संघ को एकजुट करना।
- चेतावनी: डेढ़ महीने में समाधान नहीं तो आर-पार की लड़ाई।
- रणनीति: बोकारो की खाली जमीन पर सामूहिक रूप से हल चलाकर विरोध प्रदर्शन।










