उपभोक्ताओं पर बोझ, सरकार को नुकसान, लेकिन बदस्तूर जारी है झारखंड में बालू का खेल

उपभोक्ताओं पर बोझ, सरकार को नुकसान, लेकिन बदस्तूर जारी है झारखंड में बालू का खेल

Johar News Times
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झारखंड में बालू खनन और आपूर्ति को लेकर अजीब स्थिति बनी हुई है। एक तरफ उपभोक्ताओं को महंगे दाम पर बालू खरीदना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बालू घाटों की नीलामी और संचालन में देरी के कारण सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान झेलना पड़ रहा है।

पिछले करीब आठ महीनों से राज्य में बड़े पैमाने पर बालू का उठाव हो रहा है, लेकिन घाटों का संचालन शुरू नहीं होने के कारण सरकार को टैक्स नहीं मिल पा रहा। इससे अवैध खनन को भी बढ़ावा मिल रहा है।

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अकेले रांची जिला में ही रोजाना करीब 500 हाइवा बालू की खपत हो रही है। एक हाइवा में औसतन 40 टन बालू लोड होता है, यानी प्रतिदिन करीब 20 हजार टन बालू का उपयोग हो रहा है।
पूरे राज्य में यह आंकड़ा रोजाना ढाई से तीन लाख टन तक पहुंच जाता है, लेकिन इसके बावजूद राजस्व की कमी चिंता का विषय बनी हुई है।

राज्य के कुल 444 बालू घाटों में से 298 घाटों की नीलामी पूरी हो चुकी है l 146 घाटों के लिए अभी टेंडर प्रक्रिया जारी है l

हालांकि, जिन घाटों की नीलामी हो चुकी है, वहां भी पर्यावरण स्वीकृति और प्रशासनिक मंजूरी जैसी प्रक्रियाएं पूरी नहीं होने के कारण संचालन शुरू नहीं हो पाया है।

पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले घाटों पर पेसा नियमावली के तहत ग्रामसभा का अधिकार होता है। ग्रामीण इन घाटों से घरेलू और सामुदायिक कार्यों के लिए बिना टैक्स बालू उठा सकते हैं, लेकिन व्यावसायिक उपयोग की अनुमति नहीं है।

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जानकारों का मानना है कि यदि समय पर नीलामी और स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी हो जाती, तो सरकार को हर महीने करोड़ों रुपये का राजस्व मिल सकता था। फिलहाल प्रशासनिक देरी और प्रक्रियात्मक अड़चनों के कारण नुकसान लगातार बढ़ रहा है l

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