जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर में प्रकृति के महापर्व सरहुल के अवसर पर सीतारामडेरा क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह का अनूठा संगम देखने को मिला। रविवार को आदिवासी-मूलवासी समाज द्वारा एक विशाल और भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
प्रमुख मार्गों से गुजरी शोभायात्रा
यह शोभायात्रा पुराना सीतारामडेरा स्थित उरांव समाज भवन से शुरू हुई। यहाँ से पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के साथ जुलूस एग्रीको, साकची और गोलमुरी जैसे शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों से होता हुआ वापस अपने निर्धारित स्थल पर संपन्न हुआ। पूरे रास्ते ढोल-नगाड़ों की थाप और मांदर की गूंज ने माहौल को उत्सवमय बनाए रखा।
सांस्कृतिक छटा और पारंपरिक वेशभूषा
शोभायात्रा में आदिवासी महासभा, विभिन्न सामाजिक संगठन, महिला समूह और युवा वर्ग ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- नृत्य और संगीत: पारंपरिक परिधानों में सजे युवक-युवतियां झूमर और अन्य लोक नृत्यों पर थिरकते नजर आए।
- धार्मिक आस्था: महिलाएं अपने सिर पर सरना फूल और पूजा सामग्री लेकर चल रही थीं, जो इस पर्व के प्रति उनकी गहरी आस्था को प्रदर्शित कर रहा था।
- सहभागिता: शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों ने भी इस जुलूस में शामिल होकर समाज का उत्साहवर्धन किया।
प्रकृति और मानव के अटूट रिश्ते का प्रतीक
सरहुल, जिसे आदिवासी समाज का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है, ‘साल’ (सकुआ) के वृक्ष पर फूलों के खिलने के साथ मनाया जाता है। यह पर्व जल, जंगल और जमीन के प्रति आभार प्रकट करने का माध्यम है।
“सरहुल हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति और मानव का रिश्ता अटूट है। पर्यावरण का संरक्षण ही हमारे जीवन का आधार है।”
इस अवसर पर सरना स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना की गई, जहाँ समाज की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की गई। यह आयोजन न केवल एक उत्सव था, बल्कि झारखंड की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति अटूट श्रद्धा का एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरा।









