न्यूयॉर्क: आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में भी दुनिया भर में ऊर्जा तक समान पहुंच एक बहुत बड़ी वैश्विक चुनौती बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, आज भी दुनिया के करीब 65.5 करोड़ लोग बिजली की बुनियादी सुविधा से पूरी तरह वंचित हैं।
इसके अलावा, लगभग दो अरब लोग खाना पकाने के लिए आज भी ऐसे पारंपरिक और प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों पर निर्भर हैं, जो उनके स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए एक धीमा जहर साबित हो रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि यही रफ्तार रही, तो साल 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित, सस्ती और आधुनिक ऊर्जा सुनिश्चित करने का वैश्विक लक्ष्य अधूरा रह जाएगा।
उप-सहारा अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित
‘ट्रैकिंग एसडीजी 7: द एनर्जी प्रोग्रेस रिपोर्ट’ के नवीनतम संस्करण में वर्ष 2023 और 2024 के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि दुनिया के कई हिस्सों में बिजली की पहुंच बढ़ी है, लेकिन उप-सहारा अफ्रीका की स्थिति बेहद चिंताजनक है। इस क्षेत्र में 56 करोड़ से अधिक लोग अंधेरे में जीवन जीने को मजबूर हैं, जबकि करीब 97 करोड़ लोगों के पास स्वच्छ रसोई ईंधन की कोई सुविधा नहीं है।
इनडोर प्रदूषण से स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य संबंधी बड़े खतरों की ओर इशारा किया है। पारंपरिक ईंधन (जैसे लकड़ी, कोयला, उपले) के जलने से घरों के भीतर पैदा होने वाले धुएं के कारण लोगों में श्वसन संबंधी बीमारियां, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा अब सिर्फ विकास का पैमाना नहीं, बल्कि ‘पब्लिक हेल्थ’ का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है।
स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में उम्मीद की किरण
इस निराशाजनक तस्वीर के बीच रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक पहलू भी सामने आए हैं:
- वैश्विक स्तर पर कुल बिजली खपत में ग्रीन और क्लीन एनर्जी की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
- प्रति व्यक्ति नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़कर 544 वाट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
- विकासशील देशों में स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्तीय सहायता बढ़कर 24.6 अरब डॉलर हो गई है।
फंडिंग में कमी बनी रोड़ा: 2030 का लक्ष्य दूर
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय मदद वैश्विक जरूरतों के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। चिंता की बात यह है कि सबसे कम विकसित देशों को मिलने वाली वित्तीय सहायता में गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में यह सहायता 11% घटकर महज 3.7 अरब डॉलर रह गई। संयुक्त राष्ट्र ने साफ कहा है कि जब तक अमीर देश विकासशील और पिछड़े देशों के लिए वैश्विक निवेश नहीं बढ़ाएंगे, तब तक ऊर्जा की यह गहरी खाई पाटना नामुमकिन होगा।
