तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में कथित विलय का मामला अब पूरी तरह गरमा गया है। इस संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामले पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, स्पीकर इस विषय में कोई भी जल्दबाजी करने के मूड में नहीं हैं और वे कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनेंगे।
TMC नेतृत्व को भेजा गया ईमेल, मांगा पक्ष
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पीकर कार्यालय की ओर से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल तृणमूल कांग्रेस को एक आधिकारिक ईमेल भेजा गया है। इस ईमेल के जरिए टीएमसी नेतृत्व से पूरे घटनाक्रम पर उनका रुख और आधिकारिक राय मांगी गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि संसद के आगामी मानसून सत्र की शुरुआत से पहले इस पूरे विवाद पर फैसला आ सकता है।
कानूनी रूप से पुख्ता फैसला चाहते हैं स्पीकर
सूत्रों का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष इस मामले में किसी भी कानूनी खामी से बचने के लिए केंद्रीय कानून मंत्रालय से लिखित कानूनी राय ले सकते हैं। कानून मंत्रालय इसके लिए सरकार के वरिष्ठ विधि अधिकारियों से विचार-विमर्श करेगा, ताकि स्पीकर का फैसला संवैधानिक रूप से इतना मजबूत हो कि भविष्य में अदालत में चुनौती दिए जाने पर भी बरकरार रहे।
क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून?
इस पूरे विवाद के बीच संवैधानिक विशेषज्ञों ने भी बागी सांसदों के इस कदम की वैधता पर बड़े सवाल उठाए हैं:
- लोकसभा के पूर्व महासचिव और जाने-माने संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने संविधान की 10वीं अनुसूची का हवाला दिया है।
- उनका कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल का विलय केवल संगठन/पार्टी स्तर पर ही संभव है।
- सांसद या विधायक विधायी दल के रूप में अपने स्तर पर किसी अन्य दल में ‘विलय’ की घोषणा नहीं कर सकते।
संवैधानिक कसौटी पर मामला
विशेषज्ञों की इस राय के बाद अब यह लड़ाई सिर्फ सियासी न रहकर पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनी दायरे में आ गई है। यदि यह विलय नियमों के मुताबिक नहीं पाया गया, तो बागी सांसदों की सदस्यता पर भी खतरा मंडरा सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अगले कदम और उनके अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं।
