5 जून को पूरा विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है। जगह-जगह पौधारोपण कार्यक्रम होंगे, पर्यावरण संरक्षण के संकल्प लिए जाएंगे और हरियाली बढ़ाने के दावे किए जाएंगे। लेकिन इन सबके बीच घाटशिला वन क्षेत्र और आसपास के इलाकों से सामने आ रही तस्वीरें पर्यावरण संरक्षण की जमीनी हकीकत बयां कर रही हैं।
जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों में हरे-भरे पेड़ों की लगातार कटाई जारी है। कई स्थानों पर पेड़ों के कटे हुए ठूंठ इस बात की गवाही दे रहे हैं कि विकास की दौड़ में प्रकृति को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है। जो पेड़ कल तक लोगों को छाया और स्वच्छ हवा दे रहे थे, आज उनकी जगह सिर्फ ठूंठ नजर आ रहे हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार एक विकसित पेड़ सालभर में इतनी ऑक्सीजन देता है, जिससे चार लोगों का परिवार आसानी से सांस ले सकता है। पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि प्राकृतिक जीवनदाता हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित बनाए रखते हैं। इसके बावजूद पेड़ों की अंधाधुंध कटाई चिंता का विषय बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन उनकी देखरेख के अभाव में बड़ी संख्या में पौधे कुछ ही समय में नष्ट हो जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, वर्षों पुराने बड़े पेड़ों को बचाने के लिए प्रभावी प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। इसका असर बढ़ती गर्मी, घटते जलस्तर और सूखते जलस्रोतों के रूप में दिखाई दे रहा है।
जंगल संरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रहीं जमुना टुडू का कहना है कि केवल पौधे लगाने से पर्यावरण नहीं बचेगा। इसके लिए मौजूदा पेड़ों और जंगलों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को औपचारिकता नहीं, जनभागीदारी का अभियान बनाना होगा। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि नए पौधे लगाने के साथ-साथ पहले से मौजूद हरे-भरे पेड़ों को बचाने का संकल्प लेना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि यदि पेड़ों की कटाई नहीं रुकी, तो आने वाले वर्षों में पर्यावरण संकट और गंभीर रूप ले सकता है।
