सरायकेला-खरसावां जिला अंतर्गत चांडिल के शीशमहल में आयोजित ‘पातकोम दिशोम मांझी पारगाना महाल’ का दो दिवसीय वार्षिक महासम्मेलन रविवार को पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गया। शनिवार से शुरू हुए इस दो दिवसीय कार्यक्रम में संथाल समाज की मजबूती, शिक्षा, संस्कृति संरक्षण और सामाजिक एकता को लेकर गंभीर मंथन किया गया।
महासम्मेलन का शुभारंभ शनिवार को अमर शहीद सिद्धू-कान्हू एवं संथाली भाषा की ‘ओल चिकी’ लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की मूर्ति पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता पातकोम दिशोम देश पारगाना रामेश्वर बेसरा ने की।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए दुगनी पीढ़ पारगाना दिवाकर सोरेन, सालखान सोरेन, बाबलू मुर्मू, खरसावां के मानकी दोलू सिंह सरदार, चारुचांद किस्कु, श्यामल मार्डी, कुनाराम सोरेन और महेश्वर मुर्मू समेत कई मुख्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने समाज में शिक्षा के प्रसार, संथाली भाषा व ओल चिकी लिपि के संरक्षण के साथ-साथ अपनी पारंपरिक शासन व्यवस्था ‘मांझी-परगना’ को और अधिक सशक्त करने पर विशेष जोर दिया।
“हमारी एकता ही हमारी ताकत है। जल, जंगल, जमीन और अपनी समृद्ध भाषा-संस्कृति को बचाने के लिए आज के युवाओं को आगे आना होगा और जिम्मेदारी संभालनी होगी।”
महासम्मेलन के दौरान संथाल समाज में उत्कृष्ट और सराहनीय कार्य करने वाले मांझी बाबाओं को ‘पांची गमछा’ (पारंपरिक वस्त्र) देकर सम्मानित किया गया। वहीं, पिछले 35 वर्षों से लगातार साइकिल से गांव-गांव घूमकर समाज को जागरूक करने वाले वयोवृद्ध सामाजिक कार्यकर्ता पूर्ण चंद्र बेसरा के समर्पण को देखते हुए महाल की ओर से उन्हें एक नई साइकिल भेंट कर सम्मानित किया गया।
इस दो दिवसीय महासम्मेलन में सरायकेला-खरसावां, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम के जिलों से बड़ी संख्या में मांझी, परगना, जोगमांझी और संथाल समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल हुए। कार्यक्रम का समापन पारंपरिक मांदर की थाप और सामूहिक नृत्य के साथ हुआ, जिसने उपस्थित जनसमूह का मन मोह लिया।
