देश में स्वास्थ्य बीमा कराने वाले लाखों लोग इन दिनों एक अजीबोगरीब संकट से जूझ रहे हैं। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी मरीजों को घंटों तक सिर्फ इसलिए इंतजार करना पड़ता है क्योंकि बीमा कंपनियां, अस्पताल और थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर कागजी कार्रवाई में उलझे रहते हैं। इस “कुचक्र” के खिलाफ कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्सने मोर्चा खोल दिया है और केंद्र सरकार से सख्त हस्तक्षेप की मांग की है।
स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र: संवेदनहीनता पर उठाए सवाल
चांदनी चौकके सांसद और कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि कैशलेस इलाज की सुविधा होने के बावजूद डिस्चार्ज के समय मरीजों को पूरा दिन अस्पताल में बिताना पड़ता है, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की घोर संवेदनहीनता है।
सुरेश सोंथालिया ने व्यवस्था पर दागे सवाल
कैट के राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री सुरेश सोंथालिया ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य राहत देना था, न कि प्रताड़ना। उन्होंने कहा:
“इलाज पूरा होने के बाद भी मरीज को घंटों अस्पताल में रोके रखना अमानवीय है। यह केवल कागजी देरी नहीं, बल्कि मरीजों पर अतिरिक्त बेड चार्ज और मानसिक तनाव का बोझ डालना है।”
IRDAI से ‘डीम्ड अप्रूवल’ की मांग
कैट ने बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण के चेयरमैन को भी पत्र भेजकर सख्त गाइडलाइंस की मांग की है। कैट का सुझाव है कि:
- डिस्चार्ज पेपर जमा होने के 1-2 घंटे के भीतर अंतिम मंजूरी अनिवार्य हो।
- यदि तय समय में जवाब न मिले, तो उसे “डीम्ड अप्रूवल” मान लिया जाए।
- 24×7 क्लेम क्लियरेंस की सुविधा हो ताकि छुट्टियों या रात के समय मरीज न फंसे।
मरीजों पर दोहरी मार
सोंथालिया ने बताया कि देरी के कारण अक्सर मरीजों को उस दिन का भी बेड चार्ज देना पड़ता है, जिसे बीमा कंपनियां कवर नहीं करतीं। दूर-दराज से आए परिवारों के लिए रुकने और खाने का खर्च अतिरिक्त बोझ बन जाता है। कैट के चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने तर्क दिया कि जब डिजिटल पेमेंट सेकंडों में हो सकता है, तो क्लेम सेटलमेंट में घंटों क्यों लगते हैं?










