इतिहास और आस्था की धरती पर ‘गजराज’ का कहर: ईचागढ़ में उजड़ रहे आशियाने, पलायन को मजबूर ग्रामीण

सरायकेला-खरसावाँ जिले का ऐतिहासिक ईचागढ़ क्षेत्र आज दोहरे संकट के मुहाने पर खड़ा है।

Johar News Times
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सरायकेला-खरसावाँ जिले का ऐतिहासिक ईचागढ़ क्षेत्र आज दोहरे संकट के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ जहाँ यह भूमि राजा विक्रमादित्यदेव के काल के प्राचीन शिव मंदिरों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है, वहीं दूसरी ओर यहाँ का ‘मानव-हाथी संघर्ष’ अब एक मानवीय त्रासदी का रूप ले चुका है।

आस्था के केंद्रों पर दहशत का साया

स्वर्णरेखा नदी के तट पर बसे जयदा शिव मंदिर, घोलटा शिव मंदिर और कोयलागढ़ के पंचमुखी शिव धाम में जहाँ कभी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी, वहाँ अब सन्नाटा पसरने लगा है। दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से सटे इस इलाके में हाथियों के झुंड ने ग्रामीणों का जीना दूभर कर दिया है। चांडिल डैम के विस्थापित पहले ही अपनी ज़मीन खो चुके हैं, और अब हाथियों के डर से वे अपने घरों से भी बेदखल होने की कगार पर हैं।

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खेत वीरान, घर खंडहर: डर के साये में कट रही रातें

चांडिल अनुमंडल के सुदूरवर्ती गाँवों में स्थिति भयावह है। गजराजों का झुंड शाम ढलते ही गाँवों में घुस आता है और जो भी सामने आता है उसे तहस-नहस कर देता है।

  • फसलों की तबाही: मेहनत से उगाई गई फसलें हाथियों द्वारा रौंद दी जा रही हैं।
  • पलायन का दर्द: जान बचाने के लिए कई किसान परिवार अपना गाँव छोड़ शहर की ओर रुख कर रहे हैं।
  • शिक्षा पर ब्रेक: हाथियों के खौफ से बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल हो गया है, जिससे उनका भविष्य अंधकार में है।

आखिर क्यों भटक रहे हैं हाथी?

जानकारों का मानना है कि यह समस्या प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित है। हाथियों के गाँवों की ओर रुख करने के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

  1. जंगलों की अंधाधुंध कटाई: जिससे हाथियों का प्राकृतिक आवास और भोजन खत्म हो रहा है।
  2. अवैध बालू खनन: दलमा कॉरिडोर में बढ़ते अवैध खनन ने हाथियों के पारंपरिक रास्तों को बाधित कर दिया है।
  3. चांडिल डैम का बैकवाटर: जलाशय के फैलाव के कारण हाथियों के पुराने रास्ते जलमग्न हो गए हैं, जिससे वे रिहायशी इलाकों में भटक रहे हैं।

प्रशासन की चुप्पी और ग्रामीणों का गुस्सा

ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की ‘एलिफेंट ड्राइव टीम’ सिर्फ खानापूर्ति करती है। न तो सोलर फेंसिंग की समुचित व्यवस्था है और न ही हाथियों को रोकने के लिए ट्रेंच (खाई) खोदी गई है। ग्रामीणों ने सरकार से चेतावनी भरे लहजे में मांग की है कि यदि जल्द ही इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो ईचागढ़ की ऐतिहासिक धरती पूरी तरह वीरान हो जाएगी।

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