लेबर कार्ड बना, लेकिन लाभ नहीं; जागरूकता की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा
प्रभंजन कुमार , जमशेदपुर:
औद्योगिक शहर जमशेदपुर के चौक-चौराहों पर हर सुबह एक ऐसी तस्वीर दिखती है, जो मजदूरों की हकीकत बयां करती है। खासकर मानगो चौक पर रोजाना सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर काम की तलाश में इकट्ठा होते हैं।
ये मजदूर आसपास के ग्रामीण और दूर-दराज इलाकों से पिकअप वैन के जरिए सुबह 7 बजे तक पहुंच जाते हैं। उम्मीद रहती है कि कोई ठेकेदार या मालिक उन्हें काम पर ले जाएगा, जिससे दिन भर की मजदूरी मिल सके।

सुबह 7 से 10 बजे तक इंतजार, फिर निराशा:
मजदूर सुबह से करीब 10 बजे तक चौक पर खड़े रहते हैं। इस दौरान कुछ को काम मिल जाता है, लेकिन बड़ी संख्या में मजदूर ऐसे भी होते हैं जिन्हें कोई काम नहीं मिलता और वे बैरंग घर लौटने को मजबूर हो जाते हैं।
महिला मजदूरों की संख्या ज्यादा:
इस ‘मजदूर मंडी’ में महिला मजदूरों की संख्या भी काफी अधिक होती है। वे घर की जिम्मेदारियों के साथ मजदूरी कर परिवार चलाने के लिए रोज संघर्ष करती हैं, लेकिन उन्हें कई बार कम मजदूरी और अधिक मेहनत का सामना करना पड़ता है।
लेबर कार्ड है, लेकिन फायदा नहीं:
सरकार द्वारा मजदूरों के लिए श्रमिक कार्ड (लेबर कार्ड) बनाए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश मजदूरों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
जानकारी के अनुसार, लेबर कार्ड के तहत मजदूरों को सालाना करीब 12 हजार रुपये की सहायता मिलती है, जिससे वे अपने काम के औजार, साइकिल और कपड़े खरीद सकते हैं।

लेकिन कई मजदूरों का कहना है कि कार्ड बनने के बावजूद उन्हें अब तक कोई राशि नहीं मिली। ऐसे में उनके सामने सवाल खड़ा होता है—आखिर इस योजना का फायदा कैसे मिले?
जागरूकता की कमी सबसे बड़ी वजह:
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण जागरूकता की कमी है। कई मजदूरों को योजना की पूरी जानकारी नहीं होती, वहीं कुछ को प्रक्रिया समझ में नहीं आती।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर मार्गदर्शन और फॉलो-अप की कमी भी बड़ी समस्या है।
मजदूरों को भी होना होगा जागरूक:
अधिकारियों का मानना है कि सरकार की योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा, जब मजदूर खुद भी जागरूक होंगे।
- अपने दस्तावेज अपडेट रखें
- रजिस्ट्रेशन की स्थिति जांचते रहें
- संबंधित विभाग से संपर्क करें
पुराना मुद्दा, समाधान अब भी अधूरा:
यह समस्या नई नहीं है। कई बार इस मुद्दे को उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
जमशेदपुर के चौक-चौराहों पर खड़े ये मजदूर सिर्फ काम की तलाश नहीं कर रहे, बल्कि अपने हक की भी उम्मीद लगाए हुए हैं।
मजदूर दिवस के मौके पर यह सवाल फिर उठता है—क्या योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रहेंगी या इन मेहनतकश हाथों तक भी पहुंचेंगी?
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