सरकारें भले ही ‘हर घर नल, हर घर जल’ का दावा करें, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सरायकेला जिले के नीमडीह प्रखंड की तिल्ला पंचायत से एक ऐसी ही परेशान करने वाली तस्वीर सामने आई है। यहाँ के सिरका बड़तल रोड साइड गांव में ग्रामीणों को पेयजल आपूर्ति करने के लिए लगाई गई जलमीनार पिछले लगभग दो वर्षों से हाथी का दांत बनी हुई है।
जलमीनार के बंद रहने से इस आदिवासी बहुल टोले के 80 से अधिक परिवारों के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
गर्मी में बदतर हुए हालात: 2 किमी दूर से पानी लाने को मजबूर
भीषण गर्मी के इस मौसम में यहाँ स्थिति नारकीय हो चुकी है। ग्रामीणों को पानी की एक-एक बूंद के लिए डेढ़ से दो किलोमीटर दूर स्थित चापाकलों या निजी जलस्रोतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। हद तो यह है कि बढ़ते तापमान के कारण कई चापाकल भी सूख चुके हैं।
- स्कूली बच्चे और कामकाजी महिलाएं सुबह और शाम का कीमती समय सिर्फ पानी ढोने में ही गंवा रहे हैं।
- स्थानीय ग्रामीण महिला सुनीता महतो ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “घर का सारा काम छोड़कर पानी के लिए लाइन में लगना पड़ता है। कई बार तो घंटों इंतज़ार के बाद खाली बर्तन लेकर लौटना पड़ता है। पीने का पानी जैसे-तैसे मिल भी जाए, तो नहाने-धोने के लिए पानी नहीं बचता।”
अफसरों के आश्वासन का ‘बजट’ ही नहीं आया
ग्रामीणों का आरोप है कि समस्या को लेकर उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटे। हर बार सिर्फ कोरा आश्वासन ही मिला।
ग्राम प्रधान बिरेन सरदार ने व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा: “विभाग के जेई साहब दो बार आकर जांच कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि मोटर खराब है और पाइपलाइन टूटी हुई है। हर बार कहते हैं कि बजट आते ही काम शुरू होगा। लेकिन समझ नहीं आता कि दो साल में भी इस जलमीनार के लिए कोई बजट क्यों नहीं आया? हम लोग बस सरकारी आश्वासनों के भरोसे जी रहे हैं।”
भेदभाव का आरोप: 15वें वित्त की राशि पर उठे सवाल
इस संकट ने पंचायत व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों ने सीधे तौर पर मुखिया पर पक्षपात का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मुखिया केवल अपने समर्थकों और चुनिंदा वार्डों में ही विकास कार्य करा रहे हैं, जबकि सिरका बड़तल जैसे आदिवासी बहुल टोले को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। ग्रामीणों ने पूछा कि आखिर 15वें वित्त आयोग की लाखों रुपये की राशि कहाँ खर्च की जा रही है?
दो साल से प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहे ग्रामीणों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और विभाग को अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर जलमीनार की मरम्मत कर जलापूर्ति बहाल नहीं की गई, तो वे प्रखंड कार्यालय का घेराव करेंगे और उग्र धरना-प्रदर्शन के लिए बाध्य होंगे।
